15 C
Lucknow
Wednesday, January 21, 2026

उर्दू अदब के दबंग ‘फिराक’

Must read

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

यूं तो गोरखपुर उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से का एक महत्वपूर्ण जिला है। इसकी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत भी काफी समृद्ध है। यहाँ की जलवायु समेत यहाँ की मिट्टी में अनूठी उर्वरता है। शायद यही कुछ ऐसी वजहें होगी जो नानक, कबीर, बुद्ध और गुरु गोरक्ष जैसे संतों तक को एकबारगी अपनी ओर आकर्षित किया। यहाँ की मिट्टी में ही एक ऐसा भी रत्न पैदा हुआ जिसने उर्दू अदब के आसमान में न केवल देश बल्कि दुनिया में चमक बिखेरी। गोरखपुर की मिट्टी से उसका बंधाव कुछ इस कदर था की उसने अपने प्रसिद्धि के नाम में गोरखपुर को पहचान के रूप में जोड़ दिया।
इस नूर-ए-साहित्य को वैश्विक फ़लक पर फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से जाना गया। इनका जन्म गोरखपुर शहर के तुर्कमानपुर मुहल्ले में 28 अगस्त सन 1896 में हुआ था। इनके पिता गोरख प्रसाद ‘इब्रत’ पेशे से वकील होते हुए भी एक अच्छे शायर थे। फिराक पढ़ाई में काफी तेज थे। इलाहाबाद में पढ़ाई के बाद डिप्टी कलेक्टर बन गए लेकिन तेवर और विरोधी चरित्र ने उन्हे बहुत दिनों तक नौकरी नहीं करने दिया और महात्मा गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित हो कर नौकरी छोड़ गांधीजी के साथ हो लिए। जेल की हवा भी खायी। बाद में जवाहर लाल नेहरू के सहायक हो गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षक भी रहे।
फिराक जी ने विरासत में मिली शायरी को अपनी शब्द भंडार और परंपरागत भाव बोध की चाशनी में भिगोकर नयी भाषा और नए विषयों के साथ जोड़ते हुए प्रस्तुत किया। उन्होने भविष्य की उम्मीदों और वर्तमान के कडवे सच को भारतीय संस्कृति और लोकभाषाई प्रतीकों के साथ मिलाकर ऐसा नमूना पेश किया जो शायरी में अमूमन ढूँढे नहीं मिलता। उनकी शायरी में भारतीयता की मूल पहचान का प्रतिबिम्बित होना यह दर्शाता है की वाकई में उन्हे फारसी, हिन्दी और ब्रजभाषा की अच्छी समझ है। हालांकि फिराक रुबाई, नज्म और गजल जैसी तीनों विधाओं में रचना करने में सिद्धहस्त थे लेकिन इनकी पहचान इनकी गज़लों से ही हुई।
सौंदर्यबोध के शायर माने जाने वाले फिराक ने गजल और रुबाई को न केवल नया लहजा दिया बल्कि एक अलग और नयी आवाज़ भी दी। उनके इस नयी आवाज़ में वर्तमान की बेचैनी के साथ-साथ अतीत की गूंज भी है। इनकी शायरी में आशिक और महबूब परंपरा से अलग दिखते हैं-
शाम भी थी धुआँ-धुआँ, हुस्न भी था उदास-उदास।
दिल को कई कहानियां याद सी आ के रह गई॥
शायरों में भी फिराक को काफी निर्भीक शायर माना जाता है। ये दबंग भी थे और मुंहफट्ट भी। एक वाकया है जब फिराक साहब एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे। उन्हे मंच पर काफी देर तक इंतजार करने के बाद बुलाया गया। माइक संभालते ही फिराक जी ने चुटकी लेते हुए कहा कि हाजरात! अभी तक आप कव्वाली सुन रहे थे अब कुछ शेर सुनिये। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुछ लोग ऐसे भी थे जो फिराक साहब और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को आपस में लड़ा कर मजा लेते थे। एक बार एक महफिल में फिराक साहब और झा साहब दोनों ही लोग मौजूद थे। एक साहब ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि फिराक साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं।
इस पर फिराक साहब अवसर मिलते ही बोले भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक खास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते। इस हाजिर जवाबी ने कहने वाले हाजरात का मिजाज दुरुस्त कर दिया। इनके तेवर एक उदाहरण और है जब देश आज़ाद होने के बाद जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो एक बार फिराक साहब उनसे मिलने उनके कार्यालय पहुंचे। कर्मचारी को एक पर्ची पर आर. सहाय लिख कर भेजा। बहुत देर तक जब अंदर से बुलावा नहीं आया तो फिराक साहब ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगे। आवाज सुनकर नेहरू जी बाहर आए इन्हे देखा तो साथ अंदर ले गए।
नेहरू जी ने कहा कि तुमने पर्ची पर आर. सहाय लिखा था जबकि मै तुम्हें रघुपति सहाय के नाम से ही जानता हूँ। ये था फिराक साहब का मिजाज। फिराक साहब की विशिष्ट रचनाधर्मिता ने ही इन्हें रघुपति सहाय से फिराक गोरखपुरी बनाया। इनके कविता संग्रह गुल-ए-नगमा पर इन्हे 1960 का न केवल साहित्य अकादमी जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला बल्कि 1968 में रूस का सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड और 1969 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इनके हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू साहित्य के लिए किए गए अवदान के लिए 1968 का देश का लब्ध प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से भी इन्हे नवाजा गया। सच मायने में फिराक गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र के वो जगमगाते सितारे थे जिसकी रोशनी आज भी शायरी को एक नया मकां दे रही है। अलमस्त शायर की अलमस्त शायरी उर्दू अदब की मौजूदगी तक कायम रहेगी। जीवन के उत्तरार्ध में काफी परेशानियाँ उठाने वाला यह अक्खड़ शायर 3 मार्च 1982 को यह बयान करते हुए सदा-सदा के लिए हमसे ओझल हो गया-
‘अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, यूँ ही कभूं लब खोले हैं,
पहले फिराक़ को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं’।
(लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं )
- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article