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Wednesday, January 21, 2026

SC में दाखिल याचिका में दावा- कोरोना से हर दिन मर रहे हैं 4 पत्रकार, इलाज और वैक्सीनेशन की सुविधा देने की मांग

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नई दिल्लीः पत्रकारों को भी कोरोना से लड़ाई में फ्रंटलाइन वारियर यानी अगली पंक्ति का योद्धा घोषित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है. इसमें कहा गया है कि अब तक 346 पत्रकार कोरोना से अपनी जान गंवा चुके हैं लेकिन उन्हें लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में स्पष्टता नहीं है. अगर इलाज से जुड़ी किसी सुविधा का एलान हो भी रहा है, तो सिर्फ सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए. इस विपत्ति काल में ऐसा नहीं होना चाहिए.
दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ परसेप्शन स्टडीज़ की निदेशक डॉ. कोटा नीलिमा की याचिका में कहा गया है कि इस साल अप्रैल और मई में हर दिन औसतन 4 पत्रकारों की मृत्यु कोरोना के चलते हुई है. लोगों तक समाचार पहुंचाने के लिए काम करने वाले इस वर्ग की कोई सुध नहीं ली जा रही है. कुछ राज्यों ने वैक्सीनेशन में पत्रकारों को भी प्राथमिकता देने की नीति ज़रूर बनाई है, लेकिन ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए.
कोरोना से जान गंवाने  वाले पत्रकारों के परिवार के लिए मुआवजे की भी मांग की
याचिका में कोरोना पीड़ित पत्रकारों के सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और निजी हस्पतालों में हुए खर्च की भरपाई की भी मांग उठाई गई है. वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद और वकील लुबना नाज़ के ज़रिए दाखिल इस याचिका में कोरोना से मरने वाले पत्रकारों के परिवार के लिए मुआवजे की भी मांग की गई है. कहा गया है कि कोर्ट एक न्यूनतम मुआवजा तय कर दे, ताकि अलग-अलग राज्यों की नीति में बहुत ज़्यादा अंतर न हो.
कोरोना से मरने वाले लगभग 60 प्रतिशत पत्रकार के पास नहीं थी केंद्र या राज्य सरकार की मान्यता
याचिका में केंद्र सरकार की तरफ से हाल ही में घोषित ‘पत्रकार कल्याण योजना’ के बारे में भी बताया गया है. इसमें कोरोना से मरने वाले पत्रकारों के परिवार को सहायता राशि देने की बात कही गई है लेकिन इसके माध्यम से सिर्फ सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए ही सुविधा दी जाएगी.
याचिकाकर्ता की तरफ से किए गए रिसर्च के मुताबिक कोरोना से मरने वाले लगभग 60 प्रतिशत पत्रकार ऐसे हैं, जिनके पास केंद्र या राज्य सरकार की मान्यता नहीं थी. पत्रकारों के लिए सुविधा तय करते समय मान्यता को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए. जो किसी संस्था से न जुड़े हों, स्वतंत्र काम करते हों, उन्हें भी सुविधा मिले. मीडिया संस्थानों के लिए काम करने वाले टेक्निकल स्टाफ को भी पत्रकारों की ही तरह संरक्षण मिले.
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